जागने का मन है

नींद भरे नयनो से जागने का मन है
ख़ाब सजी पलके ताकने का मन है

मेरे शेरो शब्द कर मरम्मत ख़ुदाया
ग़ज़ले अब सारी सँवारने का मन है

बिठा दे उन्हें भी पास मेरे जगा कर
रात भर यार को निहारने का मन है

रोज़ मुस्कुरा कर ये थक गई शायद
अश्कों में आँखे उबालने का मन है

बन सँवर के फिर निकले है घर से
निगाहों से नज़र उतारने का मन है

हर जगह ढूँढ आये खुद को खंडवी
अब अपने अंदर तलाशने का मन है

जय खंडवी

हक़ नही है मुझे

फिर एक बार प्यार करने का हक़ नही है मुझे
ज़ख्मे माझी ना भर पाएंगे समझ नही है मुझे

ग़ुरूर रखना अगर आसमाँ में उड़ना सीखा है
ये ना कहना मगर ज़मी की गरज नही है मुझे

अपने हालात ओ जज़बात में सिंका हूँ बहुत
ऐसे ही बंदिशो आवाज़ में खरज नही है मुझे

एक अरसे से मस्जिद की राह देखी ही कहाँ
अब तेरे सिवा कही कोई भी रब नही है मुझे

लंगरों में खाते रहे और पिये जाम रिन्दों संग
दींन ओ दौलत का कोई मज़हब नही है मुझे

जिसने हाथ बढ़ाया उसे गले लगा लिया मैंने
दिल मिलेंगे या पीठ खंजर परख नही है मुझे

जय खंडवी

मसरूफ़ तेरे जहां में

मसरूफ़ तेरे जहान में ढूँढता हूँ मैं जगह
मिलती नही मुझे तो बिखरता हूँ बेवजह

कहते है भुलाया कहाँ जो याद हम करें
गहरा है इश्क़ इतना खोजता हूँ मैं सतह

रस्साकशी चले मगर कोई गाँठ ना लगे
लग गई गर रिश्तों में खुलती नही गिरह

मिज़ाज़ ए तर्क मेरा भी कम नही मगर
ईमान अपना बेच के करता नही जिरह

हाज़िरी दर्ज करने मत आना तुम कभी
क्यूँ प्यार है निभाना बहीखाते की तरह

चखा नही जो तूने लुत्फो विसाल जय
समझेगा कैसे नादां क्या होती है विरह

जय खंडवी

इश्क़ की दियासलाई

टूटते मेरे बदन की अँगड़ाई हो तुम
मेरे चरागे इश्क़ की दियासलाई हो तुम

गर्मी में हो झीनी श्वेत चादर चांदनी
सर्दी में नर्म ओ गर्म कोई रजाई हो तुम

मेरे सोज़ो सुकूँ की बाँहे तुम ही हो
खुशियों की हर घड़ी की कलाई हो तुम

उम्र भर फिरा मंदिर मस्जिद गिरिजे
मेरी सारी दरखास्त की सुनवाई हो तुम

आसमाँ से ऊँचा तुम ग़ुरूर हो मेरा
इस सागर से भी ज़्यादा गहराई हो तुम

मिलती हो मचलती मुरादे मयस्सर
बिछड़ी जो कभी जलती जुदाई हो तुम

आगाज़ हो तुम मेरे हसीं जहां का
और मेरे रंज ओ ग़म की बिदाई हो तुम

लोंगिया मिर्च सी तेज़ तीखी कभी
और फिर कभी केसर रसमलाई हो तुम

जय खंडवी

कोई माहज़बी

कोई माहज़बी दिल की कश्ती में इश्क़ का दरिया पार कराने लगी
लहरों पे लहर बीच मझधार में उल्फ़त ओ आशनाई सिखाने लगी

उसकी बातों में जादूगरी है बहुत आँखों में जुम्बिश मदिर पान सी
पल दो पल क्या मिले दीवाने हुए रोज़ ख्वाबो में आने जाने लगी

मैंने सोचा कहाँ इश्को जज़बात का हद से बढ़ जाएगा जोशो जुनूँ
और मुझसे ज़्यादा मेरी हमसफर रस्मो दीवार दुनिया गिराने लगी

देखता हूँ मैं जब ऐसा दीवानापन मुस्कानों पे आँसुओ का चलन
अहदो वफ़ा ने यूँ कायल किया अक्ल मेरी भी सारी ठिकाने लगी

बहती नदिया अगर प्यासी नही तिशनगी जो नही किसी बात की
इतना लंबा सफर तय कर भला क्यूँ समंदर में जा के समाने लगी

जय खंडवी

मरते है तुमपे

लड़ते है झगड़ते है बिखरते है तुम पे
ज़िन्दगी से भी ज़्यादा मरते है तुम पे

मुस्कुराकर तो दीवाना कर ही देते हो
ये आँसू भी क्या खूब संवरते है तुमपे

ये काजल ये बिंदिया पायल ये कँगना
निखारते तुमको या निखरते है तुमपे

तेरे इशारे पर ही हम मर मिट जाते है
और कहाँ जादू भी मेरे चलते है तुमपे

तेरे हुस्न की गर्मियों पे सर्दियां क्या है
बर्फीले मौसम भी यूँ पिघलते है तुमपे

नींद पे मेरा अब बस कहाँ है ज़ालिम
सो गया गर तो ख़्वाब टहलते है तुमपे

इश्क़ के दरिया में डूब जाने के डर से
संभल चलते है पर फिसलते है तुमपे

एक पल भी मुझे गर ना तुम देखो तो
बेवजह जज़बात मेरे गरजते है तुमपे

ज़िदो को मेरी

कुछ सफर में सहम के खतम हो गयी थी
कुछ पहन के कफन ये दफन हो गयी थी
कुछ ज़िंदा रह गई रोज़ मर मर के मुझमें
उम्र भर ना भरे जो वो ज़ख़म हो गयी थी

तूने आकर है छेड़े मेरी ज़िद के तार यूँ

ज़िदों को तूने मेरी फिर ज़िंदा कर दिया
ज़मीं पे था आसमाँ का परिंदा कर दिया

लहरों की तरह किनारो पे दम तोड़ती थी
घुटकर भी मेरा ये जिस्म नही छोड़ती थी
कभी आ जाती थी लबो पे तम्मन्ना बनके
मेरे जुनून ओ जज़्बात को ये टटोलती थी

तूने आकर बनाई मेरी ज़िद की तक़दीर यूँ

ज़िदो को तूने मेरी इतना अपना कर लिया
पल पल जी रहा सलोना सपना कर दिया

कभी खिलखिलाती कभी लड़खड़ाती थी
किसी पे भी इतना हक़ कहाँ जताती थी
कब सुबह जाग कर किसी को बुलाती थी
और कहाँ कभी ये यूँ रात भर सताती थी

तूने मिलकर इन्हें जगाया कुछ इस तरह

ज़िदो को तूने मेरी अपना हिस्सा कर लिया
बार बार सुनता हूँ मैं ऐसा किस्सा कर दिया